अर्थव्यवस्था तो पांचवीं, पर ओलंपिक की मेज़बानी में क्यों पिछड़ा भारत

indias olympic hosting lag despite being 5th largest economy

पेरिस में ओलंपिक की शुरुवात हो चुकी है। भारत समेत कई देश के खिलाड़ियों का दल पेरिस पहुंच चुका है। इस साल खिलाड़ियों से मैडल जितने की उम्मीदें और भी ज्यादा बढ़ गई है। आज भारत वैश्विक आर्थिक दृष्टि से एक उभरती हुई महाशक्ति के रूप में उभरा है। देश की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगातार वृद्धि हो रही है और यह विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। देश की विशाल जनसंख्या, युवा ताकत और बढ़ती आय ने इसे वैश्विक निवेशकों के लिए आकर्षक गंतव्य बनाया है। परंतु इसके बावजूद, एक सवाल जो अक्सर लोगो के बीच उठता है, वह है विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने पर भी ओलंपिक की मेज़बानी का न कर पाना।

बात करे तो ओलंपिक खेलों की मेज़बानी करना एक देश की वैश्विक छवि को निखारने का सुनहरा अवसर प्रदान करती है। यह न केवल खेलों के विकास को बढ़ावा देता है बल्कि देश की बुनियादी इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसे, परिवहन, संचार और पर्यटन क्षेत्रों में विकास को भी प्रेरित करता है। जिसे हमारा पड़ोसी मुल्क चीन पहले ही समझ चुका था इसलिए चीन ने 2008 के बीजिंग ओलंपिक के माध्यम से दुनिया को दिखाया कि कैसे एक उभरती अर्थव्यवस्था खेलों के माध्यम से विश्व नेतृत्व का दायित्व उठा सकती है। इस आयोजन ने चीन की छवि को एक आधुनिक और शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। फिर सवाल उठता है कि भारत ओलंपिक की मेजबानी क्यों नहीं कर पा रहा है?

इसका एक प्रमुख कारण देश में बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी होना। क्योंकि ओलंपिक्स की मेजबानी कराने के लिए आपको अलग अलग स्टेडियम का निर्माण करना पड़ेगा। जिसमे भारी भरकम खर्च के साथ साथ काफी समय और संसाधन भी लगेगा। हालांकि सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास पर भारी निवेश किया है, पर फिर भी यह अंतरराष्ट्रीय स्तर के अनुसार खेल सुविधाओं में हम दुनिया के देशों से अभी काफी पीछे है।

लेकिन इससे कहीं अधिक गंभीर समस्या है। देश में खेल संस्कृति का विकसित न हो पाना। आपने एक गीत सुना होगा ‘पढ़ोगे लिखोगे बनोगे जनाब,खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब’ यह पंक्तियां हमारे समाज के लिए बिल्कुल सही बैठती है। आज भी हम खेल को गंभीरता से नहीं लेते, इसे करियर बनाने का तो छोड़िए अगर कोई सोचे तो उसे के कह दिया जाता की ‘कुछ पढ़ो लिखो,क्यूं खेलकूद में समय बर्बाद कर रहे हो ‘।
इस धारणा को क्रिकेट की लोकप्रियता ने बदला। अब खेल को एक करियर विकल्प के रूप में देखने का नजरिया बदला है। क्रिकेट की सफलता ने अन्य खेलो को एक राह और उदारण दिया की अगर आप जबरदस्त मार्केटिंग, बड़ा निवेश और कड़ी मेहनत करे तो आप भी बाकी खेलों को क्रिकेट की तरह लोकप्रिय खेल में बदल सकते है। देश में सभी खेलों की सफलता के लिए जनता का व्यापक समर्थन और उत्साह बहुत जरूरी है। हालांकि भारत में खेलों के प्रति रुझान बढ़ रहा है, लेकिन अभी भी खेल को मुख्यधारा में लाने के लिए काफी काम करना बाकी है।

अगर भारत 2036 में ओलंपिक को होस्ट करना का सपना तभी साकार हो सकता है। जब इसे राष्ट्रीय लक्ष्य के रूप में स्वीकार करे। ओलंपिक की मेजबानी करना कोई एक या दो महीनो का आयोजन नहीं है। यह दशकों की मेहनत, योजना और निवेश की मांग करती है साथ में एक कुशल प्रशासनिक क्षमता, खेल प्रशासन में पारदर्शिता होना भी अनिवार्य है। भारत को एक दूरगामी रणनीति बनाने की आवश्यकता है जहां खेल को शिक्षा, स्वास्थ्य और राष्ट्रीय विकास के साथ जोड़ा जाए। खेल प्रशासन में सुधार, खेल संस्कृति को बढ़ावा देने, और अंतरराष्ट्रीय खेल समुदाय के साथ सहयोग में शामिल होकर, सरकार को निजी क्षेत्र को भी इस प्रयास में शामिल करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

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